🥺मृत्यु के बाद 10 दिनों तक पिंडदान क्यों किया जाता है?🤯🤔✍️

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मृत्यु के बाद 10 दिनों तक पिंडदान क्यों किया जाता है? | सम्पूर्ण जानकारी

हिंदू धर्म में जब किसी व्यक्ति की मृत्यु होती है, तो उसके बाद कई धार्मिक क्रियाएं की जाती हैं। उन्हीं में से एक है पिंडदान, जिसे विशेष रूप से 10 दिनों तक लगातार किया जाता है। यह सिर्फ एक परंपरा नहीं, बल्कि आत्मा की शांति, मोक्ष और अगले लोक की यात्रा के लिए जरूरी एक आध्यात्मिक प्रक्रिया है।


हिंदू धर्म के अनुरूप, किसी व्यक्ति के मृत्यु के बाद 10 दिन तक शुद्धि और क्रिया करम चलते हैं। इस दौरन पिंड दान और श्राद्ध क्रिया की अलग-अलग विधि होती है। यहां 10 दिनों के मुख्य दिन और उनमें होने वाले कार्यक्रमों का समापन वर्ष है:

 1. प्रथम दिन (पहला दिन) - अंत्येष्टि संस्कार / दहन के बाद:

 शरीर का अंतिम संस्कार होता है।

 दहन के बाद अस्थि संचय और स्नान किया जाता है।

 पिंड दान प्रारंभ होता है.


 2. दूसरा से नव्वा दिन (दूसरे से नौवें दिन):

 हर दिन एक-एक पिंड दान दिया जाता है।

 ये पितृ के शरीर के निर्माण के लिए मन जाता है।

 हर दिन एक-एक अंग (जैसे नेत्र, हृदय, हाथ, जोड़ी, आदि) का सृजन होता है।

 क्या दौरान ब्राह्मण को दान और भोजन भी दिया जाता है।


 3. दसवा दिन (10वां दिन) - दशगात्र विधि:

 इस दिन दशगात्र क्रिया होती है जो शुद्धि का प्रतीक है।

 10 पिंड दान किये जाते हैं।

 यही दिन मूल रूप से पितृ के नये शरीर के सृजन का अंतिम चरण मन जाता है।

 क्या दिन स्नान, पूजा, पिंड दान और दान-दक्षिणा की जाती है।


 बाद के दिन:

 11वां और 12वां दिन: एकादश और द्वादशा श्राद्ध - ये भी पिंड दान और भोज के लिए होते हैं।

 13वां दिन (तेहरावीं): सार्वजनिक भोज और श्राद्ध।

 मासिक श्राद्ध: 1 महीने के बाद.

 बार्सिक श्राद्ध: 1 साल बाद, पितृ पक्ष में।

ये सवाल बहुत ही महत्वपूर्ण है, और हिंदू धर्म के अनुसर पिंड दान के दौरन मृत्यु के बाद आत्मा के लिए एक सूक्ष्म शरीर का निर्माण किया जाता है। क्या सूक्ष्म शरीर के अंग (शरीर के अंग) प्रति दिन के पिंड दान के मध्यम से बनते हैं।



 ये प्रक्रिया 10 दिनों तक चलती है, जिसे "दशगात्र क्रिया" कहते हैं। हर दिन एक विशेष अंग का निर्माण होता है। नीचे हर दिन का वर्णन है:

 1. पहला दिन (पहला दिन):

 सर (हेड) का सृजन होता है।

 2. दशहरा दिन (दूसरा दिन):

 कान (कान), आंखें (आंखें), नाक (नाक), मुंह (मुंह) का सृजन होता है।

 3. तिसरा दिन (तीसरा दिन):

 गर्दन (गर्दन) और पीठ (पीठ) का निर्माण होता है।

 4. चौथा दिन (चौथा दिन):

 हाथ और उंगलियाँ का सृजन होता है।

 5. पांचवा दिन (5वां दिन):

 जोड़ी और उंगली (पैर और उंगलियां) का निर्माण होता है।

 6. छठ दिन (छठा दिन):

 पेट (पेट) और जठर (पाचन अंग) बनते हैं।

 7. सातवा दिन (सातवां दिन):

 हृदय का निर्माण होता है।

 8. आठवा दिन (8वां दिन):

 नभ (नाभि) और शरीर के आंतरिक अंग बनते हैं।

 9. नौवा दिन (9वां दिन):

 शरीर का संपूर्ण संगठन होता है - यानी पूर्ण रूप से आत्मा के लिए एक सूक्ष्म शरीर का सृजन।

 10. दसवा दिन (10वां दिन):

 क्या इस दिन हम निर्मित सूक्ष्म शरीर में चेतना या जीवन तत्व प्रवेश करता है।

 शुद्धि क्रिया की जाती है.

 इस दिन 10 पिंड दान किये जाते हैं - एक तरह से संपूर्ण शरीर को पूर्णता दी जाती है।

 ये पूरी क्रिया इस तरह की जाती है ताकि मृत्यु के बाद आत्मा अपनी नई यात्रा के लिए तैयार हो सके - चाहे पितृ लोक हो या पुनर्जन्म।

 
 

पिंडदान क्या होता है?

पिंडदान एक धार्मिक क्रिया है जिसमें आटे, तिल, चावल और जल से बने गोल आकार के लड्डू जैसे पिंड बनाए जाते हैं और मृत आत्मा को अर्पित किए जाते हैं। इसका उद्देश्य आत्मा को नया सूक्ष्म शरीर देना है जिससे वह अपने अगले सफर पर जा सके।


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पिंडदान क्यों जरूरी है?


1. आत्मा को नया शरीर देना:
मृत्यु के बाद आत्मा अपना स्थूल (भौतिक) शरीर छोड़ देती है, लेकिन उसे यमलोक या पितृलोक की यात्रा के लिए एक सूक्ष्म (यात्रा करने योग्य) शरीर चाहिए होता है। यह शरीर पिंडदान के माध्यम से दिया जाता है।


2. भूख-प्यास से मुक्ति:
आत्मा मृत्यु के बाद भी कुछ समय तक भौतिक इच्छाओं से जुड़ी रहती है। पिंडदान उसे भूख-प्यास, मोह और बंधनों से मुक्ति देता है।


3. मोक्ष या पितृलोक की ओर प्रस्थान:
बिना पिंडदान के आत्मा भटक सकती है। सही विधि से किए गए पिंडदान से आत्मा को शांति मिलती है और वह आगे बढ़ पाती है।






10 दिनों तक पिंडदान क्यों किया जाता है?

हिंदू धर्मग्रंथों के अनुसार, मृत्यु के बाद आत्मा 10 दिनों तक पृथ्वी लोक पर रहती है। ये 10 दिन आत्मा के लिए बेहद संवेदनशील होते हैं।

हर दिन का महत्व:

पहले 3 दिन: आत्मा भ्रम में रहती है। उसे समझ नहीं आता कि वह मर चुकी है।

4वें से 7वें दिन: आत्मा को धीरे-धीरे स्थिति समझ आती है और मोह खत्म होने लगता है।

8वें से 10वें दिन: आत्मा पितृलोक या यमलोक की यात्रा के लिए तैयार होती है।


हर दिन के पिंडदान से आत्मा को उसके सूक्ष्म शरीर का एक-एक अंग प्राप्त होता है। जैसे:


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10वें दिन (दशगात्र) का विशेष महत्व

10वें दिन को ‘दशगात्र’ कहते हैं। यह दिन आत्मा को पूर्ण शरीर मिलने का प्रतीक है। इस दिन पिंडदान के साथ-साथ ब्राह्मणों को भोजन और दान दिया जाता है। आत्मा को पितरों की श्रेणी में सम्मिलित करने की प्रक्रिया इसी दिन पूरी होती है।


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11वां और 12वां दिन क्या होता है?

11वां दिन (एकादशी): यह आत्मा की शुद्धि और पापों के नाश का दिन होता है। इस दिन विशेष श्राद्ध कर्म किया जाता है।

12वां दिन (द्वादशी): आत्मा को अब यमलोक या पितृलोक के लिए पूर्ण विदाई दी जाती है।



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तेरहवीं (13वां दिन):

यह अंतिम संस्कार की प्रक्रिया का अंतिम दिन होता है। इसे 'श्राद्ध भोज' या 'तेरहवीं' कहते हैं। इस दिन ब्राह्मणों और रिश्तेदारों को भोजन करवा कर मृत आत्मा के लिए शांति की कामना की जाती है। इसके बाद परिवार सामान्य जीवन की ओर लौटता है।


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निष्कर्ष (Conclusion):

पिंडदान केवल एक धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि आत्मा के अगले जीवन की यात्रा में उसका सहयोग है। यह आत्मा को भटकाव से बचाता है और उसे शांति प्रदान करता है। 10 दिनों तक पिंडदान करना आत्मा को नया जीवन देने जैसा है — एक ऐसा जीवन जो उसे मोक्ष या पितृलोक की ओर ले जाता है।
बहुत अच्छा सवाल रोहित! अब मैं आपको पहले दिन के पिंडदान की महत्वता और प्रक्रिया को विस्तार से, सरल भाषा में समझाता हूँ ताकि आप अपने ब्लॉग में उसे दमदार तरीके से लिख सको।


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पिंडदान का पहला दिन – आत्मा के लिए नया जन्म

पहले दिन का महत्व:

जब किसी व्यक्ति की मृत्यु होती है, तो उसका स्थूल (भौतिक) शरीर पंचतत्व में विलीन हो जाता है, लेकिन उसकी आत्मा अभी भी उसी लोक (धरती) में भटक रही होती है।
पहला दिन आत्मा के नए जीवन (सूक्ष्म शरीर) की शुरुआत का प्रतीक होता है।

> पहले दिन का पिंडदान आत्मा को “सिर” (मस्तिष्क) देता है।



हिंदू मान्यता के अनुसार, सूक्ष्म शरीर के निर्माण की प्रक्रिया में हर दिन एक-एक अंग पिंडदान से बनता है। पहले दिन सिर (या मस्तिष्क) दिया जाता है ताकि आत्मा को "सोचने और समझने की क्षमता" मिल सके।


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आत्मा की स्थिति पहले दिन:

आत्मा भ्रम की स्थिति में होती है।

उसे यह एहसास नहीं होता कि वह मृत्यु को प्राप्त कर चुकी है।

वह अपने घर-परिवार, शरीर, और संबंधों से जुड़ी रहती है।

यही कारण है कि पहले दिन का पिंडदान आत्मा के ‘ज्ञानेंद्रिय’ को जागृत करने के लिए सबसे जरूरी होता है।



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पहले दिन की क्रिया कैसे की जाती है?

1. स्थान:
आमतौर पर घर के आंगन, नदी के किनारे, या श्मशान के पास यह क्रिया की जाती है।


2. सामग्री:

गेहूं या चावल का आटा

तिल

काला तिल और कुशा घास

गाय का दूध या जल

गोमूत्र, गोबर (कुछ परंपराओं में)

पवित्र पात्र (थाली/डोंगा)



3. पिंड बनाने की प्रक्रिया:
आटे से एक गोल पिंड बनाया जाता है जो सिर का प्रतीक होता है। इसे तिल और जल के साथ धरती पर अर्पित किया जाता है।


4. मंत्र और श्रद्धा:
ब्राह्मण मंत्रों के साथ पिंड अर्पित करता है और आत्मा से निवेदन करता है कि वह इस पिंड को स्वीकार करे।




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आध्यात्मिक प्रभाव:

यह क्रिया आत्मा को यह समझने में मदद करती है कि वह अब जीवित नहीं है।

आत्मा को आध्यात्मिक चेतना मिलती है जिससे वह आगे की यात्रा के लिए तैयार होती है।

"सिर" बनने के साथ आत्मा को पहला अनुभव मिलता है कि उसे नया शरीर दिया जा रहा है।




> जब किसी प्रियजन की मृत्यु होती है, तो उसका भौतिक शरीर समाप्त हो जाता है, लेकिन आत्मा कुछ समय तक इस लोक में बनी रहती है।
मृत्यु के पहले दिन किए गए पिंडदान से आत्मा को नया "सिर" प्राप्त होता है।
यह सिर आत्मा की पहचान, चेतना और दिशा का प्रतीक है।
यह पहला पिंड आत्मा को यह महसूस कराता है कि वह अब एक नई यात्रा की शुरुआत कर रही है।
यही कारण है कि पहले दिन का पिंडदान आत्मा के लिए बहुत अहम और पवित्र माना जाता है।





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