Fact of death 🙇

Bilkul  🤔 yeh ek kaafi gehra aur samajik taur par chhota hua mudda hai. Aaj ki generation ka is tarah ke rivaazon ke prati jo nazariya hai, us par ek blog likhna samay ke saath chalne ka ek acha tareeka hai. Neeche ek blog draft diya gaya hai jo is topic ko samajhne, mehsoos karne aur samajik sandarbh mein explore karta hai:

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 "13वें का भोज: रिवाज़, रस्म या दिखावा?"

लेखक: Rohit

इंसान की मौत के बाद जब 13वाँ होता है, तो यह एक रस्म होती है, जिसमें परिवार और समाज एकत्र होकर दिवंगत आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना करते हैं। यह परंपरा हमारे समाज में पीढ़ियों से चली आ रही है। पर आज के समय में इस रस्म का जो रूप बन गया है, वह सोचने पर मजबूर कर देता है।

अक्सर सुनने को मिलता है, "गर्म पुरी लाना", "मीठा क्या बना है?", "कितना खर्चा किया?" — यह सब बातें एक दुखद मौके को मानो एक पार्टी में बदल देती हैं। कुछ लोग तो सिर्फ खाने के लिए आते हैं, और यह कहते हुए सुने जाते हैं, "भाई, मटर पनीर तो होना चाहिए, मोहनथाल मीठे में होना चाहिए।"

क्या यही मकसद था इस रस्म का?

हमारे बुज़ुर्गों ने यह परंपरा इसलिए बनाई थी ताकि समाज, दुखी परिवार के साथ खड़ा रहे, उन्हें सहारा दे, और मिलकर प्रार्थना करे कि उस आत्मा को शांति मिले। लेकिन आज की दौड़ती-भागती जिंदगी में हम रस्म निभाते हैं, पर उसका भाव भूलते जा रहे हैं।

नई पीढ़ी क्या सोचती है?

आज की यंग जनरेशन इन रस्मों को "पैसे की बर्बादी" या "दिखावे का माध्यम" मानने लगी है। कहीं न कहीं वे सही भी हैं, क्योंकि अगर भावना की जगह दिखावा रह जाए, तो रस्म का कोई अर्थ नहीं रह जाता।

पर इसका मतलब यह नहीं कि हम परंपराएं तोड़ दें। बल्कि ज़रूरत है कि हम इन्हें नए भाव से निभाएं। भोजन की जगह एकत्र होकर प्रार्थना करें, दिवंगत की यादों को साझा करें, और जो खर्च भोज में करना था, वो किसी ज़रूरतमंद की मदद में लगा दें — यही असली श्रद्धांजलि होगी।

निष्कर्ष:

परंपराएं तब तक ज़िंदा रहती हैं जब तक उनमें भावना होती है। "गर्म पुरी लाओ" से ऊपर उठकर, अगर हम "दुआओं की थाली" सजाएं — तो 13वें की रस्म सिर्फ एक रिवाज़ नहीं, एक सच्ची श्रद्धांजलि बन जाएगी।



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